शनिवार, 1 जुलाई 2017

वैविध्य और कल्पनाशीलता सृजन की एक अनिवार्य ज़रूरत है। एक ही तरह की किताब, धुन, या पेंटिंग से कोई कलाकार सफ़ल या लोकप्रिय भले हो जाय पर अपनी रचना- यात्रा में यदि वो क्रमशः विकास न करे तो कहीं न कहीं प्रश्नचिन्ह लग ही जाते हैं । पंचम दा में विविधता का ये गुण भरपूर था। उनके संगीत में इतने तरह के शेड्स हैं कि वो हमें हर बार हैरान कर जाते हैं। इसी अद्भुत प्रतिभा के कारण वो हमारे समय के सबसे बड़े संगीतकार बन गए। अभिनय में जो विशेषता संजीव कुमार में है संगीत में वही राहुलदेव बर्मन में। अनगिनत उदाहरणों में सिर्फ़ एक पर बात करें तो 1975 की दो सफल फ़िल्में- शोले और आँधी, दोनों में पंचम का संगीत पर दोनों की शैली इतनी जुदा कि उनकी इस खूबी से जो वाकिफ़ न हो उसके लिए यकीन करना नामुमकिन हो जाय। पाश्चात्य धुनों का भारतीयकरण भी उन्होंने इतनी खूबसरती से किया है कि श्रोता मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। अपनी छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने संगीत के इतने बेशकीमती मोती बिखेर दिए कि आज तक उनके चाहने वाले उन्हें चुन रहे हैं। रीमिक्स वालों की एक पीढ़ी तो उन्हीं के कारण जिन्दा है।

लता मंगेशकर की सुमधुर आवाज़ के साथ उन्होंने अपने सांगीतिक जीवन का आरंभ किया। " घर आजा घिर आये " जैसा बेमिसाल गीत ये सिद्ध करने को पर्याप्त था कि संगीत आकाश पर एक ऐसा सितारा उग चुका है जिसकी चमक अनंत काल तक बनी रहने वाली है। अपनी संगीत यात्रा के पहले चरण में उन्हें अपने दौर के सारे बड़े गायकों की आवाज़ का साहचर्य मिला। मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, किशोर कुमार, मन्ना डे, मुकेश, यसुदास, भूपेंद्र और सुरेश वाडकर जैसे बेहतरीन गायकों के स्वर और पंचम के सुर की जुगलबंदी खूब जमीं। आठवें दशक में खराब स्वास्थ्य के चलते डॉक्टर्स ने उन्हें संगीत से दूर रहने की सलाह दी। पर उनके लिए ये दूरी बनाये रखना सम्भव नही था। 1942 A Love Story में दिया गया संगीत उनकी अंतिम और यादगार धरोहर बन के रह गया। "कुछ न कहो " और "इक लड़की को देखा तो" जैसे मधुर गीतों पर कुमार सानू पूरे जीवन नाज़ कर सकते हैं। कविता कृष्णमूर्ति के हिस्से में भी इस फ़िल्म का एक बेहद सुंदर एकल गीत " प्यार हुआ चुपके से" आया।
27 जून को पंचम दा का जन्मदिन था। सुबह सुबह यूनुस भाई की Graffiti से ये जानकारी मिली। दिन भर ऐसी व्यस्तता रही कि न तो कुछ सुनने का संयोग बना न ही देखने का। इसी बीच मयूरेश जी की फेसबुक पोस्ट से मालूम पड़ा कि सोनी चैनल पर पंचम दा पर आधारित कोई कार्यक्रम आया जिसमें लता जी या उनके किसी गीत का ज़िक़्र नही था। ये पढ़कर उन्हीं की तरह मैं भी हैरान हुआ। क्या लता जी के ज़िक़्र के बग़ैर पंचम के संगीत पर कोई बातचीत पूर्ण हो सकती है?? मुझे तो असंभव लगता है।
इस तरह के विवाद पहले भी उठते रहे हैं। किसी साक्षात्कार में जब हृदयनाथ मंगेशकर से पूछा गया कि "आशा ताई का आरोप है कि पंचम दा ने अच्छे गीत दीदी को दिए और तेज धुन वाले गीत मुझे" तो उनका जवाब था कि-- " पंचम दा बहुत गुणी संगीतकार थे। उन्हें ये पता था कि किस गीत के साथ कौन सा गायक न्याय कर सकता था। "
ये उत्तर बिल्कुल सही था। उन्होंने इस बिंदु पर रिश्तों का ख़याल कभी नही किया ..। बहुत से गीत ऐसे भी हैं जो उस समय के नवोदित गायकों के हिस्से में आये। कई बार निर्माता के बजट और निर्देशक की योजना के हिसाब से भी चलना पड़ता है।
ये आरोप भी ग़लत है कि आशा भोंसले को उन्होंने अच्छे गीत नही दिए। "इज़ाज़त" के लाज़वाब गीतों को कौन भूल सकता है? "परिन्दा" जैसी हिंसा प्रधान फ़िल्म में भी सुरेश वाडकर और आशा भोंसले से उन्होंने दो ऐसे युगल गीत गवाए जो सर्वकालिक बेहतरीन प्रेम-गीतों की सूची में जगह रखते हैं.. पहला-- तुमसे मिल के ऐसा लगा तुमसे मिल के और दूसरा-- प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी।
ऐसे जाने कितने उदाहरण और होंगे।

लता जी के बेहद प्रिय सौ गीतों की सूची बनाऊँ तो उसमें यकीनन 20 से 25 गीत पंचम के होंगे। लता और पंचम के गीतों का जादू इस तरह है जैसे किसी खिले हुए फूल पर शबनम की एक बूँद ठहर गयी हो।
इस युगलबंदी के गीतों को याद करने लगा तो देखते देखते 21 गीत सामने आ गए। अलग अलग, तीसरी मंजिल, हम किसी से कम नहीं जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के बहुत से यादगार गीत अभी भी बाकी हैं।

घर आजा घिर आये-- छोटे नवाब
बीती न बिताई रैना-- परिचय
नाम गुम जाएगा-- किनारा
मीठे बोल बोले -- किनारा
अब के ना सावन बरसे -- किनारा
इस मोड़ से जाते हैं-- आँधी
तुम आ गए हो -- आँधी
तेरे बिना ज़िन्दगी से -- आँधी
रैना बीती जाय-- अमर प्रेम
बड़ा नटखट है-- अमर प्रेम
भोर भई पंछी धुन ये सुनाए-- आँचल
चोरी चोरी चुपके चुपके-- आपकी क़सम
करवटें बदलते रहे-- आपकी कसम
आजकल पाँव जमीं पर-- घर
सावन के झूले पड़े-- जुर्माना
ऐ री पवन-- बेमिसाल
जाने क्या बात है -- सनी
आपकी आंखों में कुछ-- घर
तेरे बिना जिया जाय न-- घर
सिली हवा छू गयी-- लिबास
खामोश सा अफसाना-- लिबास

20 टिप्‍पणियां:

  1. गंगा जी आपका ग्यान और लेखन शैली अद्भुत है.

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    1. नीरज सर जी, इतने बड़े बड़े शब्द कहकर अपने छोटे भाई को शर्मिंदा क्यूँ करते हैं :)

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  2. बहुत सुंदर लिखा है,आपने ।
    पंचम दा सी विविधता,आपके लेखन में भी है, किताबों की सारगर्भित समीक्षाएं करते आपने संगीत पर भी इतना अच्छा लिखा ।
    उल्लिखित सारे गीत बार बार सुनने योग्य ।

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    1. शुक्रिया रश्मि जी :) संगीत भी उतना ही प्रिय है, जितना किताबें अतः बड़े स्वाभाविक रूप से फिल्म और संगीत पर मंथन चलता रहता है। बस दिक्कत एक ही है कि जितने व्यवस्थित रूप में ये विचार मन मे आते हैं उस तरह से लिखते समय नही आते 😢

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  3. #हिंदी_ब्लागिंग ... अन्तर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स डे की शुभकामनायें !!

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  4. पहला दिन, पहली पोस्ट और हम आ भी गए... लिखते रहिये...

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    1. शुक्रिया शेखर सुमन जी। दुआ कीजिये कि सिलसिला चलता रहे ☺

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  5. सुन्दर पोस्ट! शायद आरडी के स्वर्णिम काल मे दूसरे कोई संगीतकार इतने सफल नही हुए। बर्मन दा के वेस्टर्न प्रयोग ज्यादा पसंद नहीं आए पर आपने जिन गीतों का जिक्र किया उनसे पूरी तरह से सहमत।
    धन्यवाद।

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    1. शुक्रिया सागर जी। मुझे भी वही गीत प्रिय हैं जिनका ज़िक़्र यहाँ कियाहै। वेस्टर्न गीत कभी किसी खास मौके पर ही सुने जा सकते हैं।

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  6. बहुत बढिया, शुभकमानाएँ

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  7. आप तो माहिर हैं लेखन में ..........ब्लॉगजगत में आपका स्वागत है

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  8. ब्लॉग जगत में स्वागत .... ये सभी गीत अधिकतर लोगों को पसंद हैं |

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  9. जय हिन्द...जय #हिन्दी_ब्लॉगिंग...

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  10. बहुत अच्छा लगा पढ़कर बहुत से गीत तो पढ़ते समय ही गुनगुनाते हुए पढ़ी पोस्ट ... किसी भी तरह के प्रसारण में इस तरह की विवादित बातें मैन को दुखी करती ही हैं , सच तो सच ही है, सामने लाये बगैर भी गीत लता के भी सुने जाते रहेंगे, संगीत मिलाता है अलग नहीं करता भी पढ़ा है कहीं ....

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अर्चना जी। संगीत स्वयं सारे निर्णय करने में सक्षम है।

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