गुरुवार, 13 जुलाई 2017

खेतों और खलिहानों की यादें

स्मृतियाँ किसी चंचल पक्षी की तरह होती हैं जो चाहे जब अपने कोमल पंख फड़फड़ाती हुई आती हैं और मन के आँगन में कोई कोना ढूँढकर बैठ जाती हैं। यादें अगर बचपन की हों  तो उनको रोकना वैसे भी मुमकिन नही। चाहे जब तैरती हुई सी चली आती हैं वो।

गाँव के उत्तरी सिरे पर बसे होने कारण दक्षिण की तरफ गाँव और अन्य तीनों दिशाओं में खेत हैं। ठंडियों में  जब गेहूँ और सरसो की फसल लहलहाती है तो नयनाभिराम दृश्य उपस्थित हो जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य की ये छटा धान की फसल के समय भी बरकरार रहती है। जहाँ तक नज़र जाती है। हरियाली का अनंत विस्तार ही दिखाई देता है।
मनुष्य की बुनियादी जरूरतों के कारण खेतों की खूबसूरती तो आज भी विद्यमान है पर विकास की सनातन प्रक्रिया में बहुत सी ऐसी चीजें ग्रामीण परिवेश से विदा हो चलीं जिनके कारण किसी समय हर गाँव में उत्सव जैसा माहौल होता था।

उन दिनों घर के आसपास बहुत बड़ी बाग थी जो कहने को तो आज भी है पर उजड़ी हालत में। धीरे धीरे पुराने समय के वो विशालकाय वृक्ष समाप्त होते गए जिनके नीचे चारपाई बिछाकर गर्मियों की अधिकांश दोपहरें बिता देना गर्मी से बचने का एकमात्र उपाय और प्रिय शगल था। बाग और हमारे घर के बीच की खाली जगह पर उस समय पूरे गाँव के खलिहान थे जहाँ धान, गेहूँ और अरहर जैसी फसलों का निपटारा होता था। पूरे दिन धान सटकने की आवाज़ें चारों तरफ़ गूँजती रहती थी। बची हुई पुआल के बड़े बड़े ढेर लगाकर छोड़ दिये जाते थे जो हमारी पीढ़ी के बच्चों के लिए लुकाछिपी खेलने के काम आते थे। उन ढेरों में छुपने की जगह तो बन ही जाती थी साथ ही बिस्तर बिछाकर रात बिताने की व्यवस्था भी । गद्दों की विलासिता गाँव के कुछ विशेष घरों तक ही सीमित थी । सर्दी की भयानकता से बचने के लिए पुआल से अच्छा कोई विकल्प गरीबों के पास नही था, जिसे लोग अपने बिस्तर के नीचे फैला लेते थे ताकि नीचे की ठंड ऊपर न आ पाये। जाड़े की तमाम कठिन रातें , हम किशोर मित्र खलिहानों में भी हँसते खेलते बिता देते थे। रात को खाने के बाद बड़ी बहनें भी घूमते घामते आ जाती थीं और पढ़ाई के साथ साथ कुछ किस्सों कहानियों के दौर भी चल पड़ते थे।

गर्मियों में गेहूँ की मड़ाई के समय इन खलिहानों की रौनक कुछ और बढ़ जाती थी। शाम ढलने तक वहाँ कोई न कोई काम होता ही रहता था । रात को हर घर से कोई एक व्यक्ति अपने फसल की रखवाली के लिए सोने आता था और देर रात तक चहलपहल रहने से ये दिन बड़े खास हो जाते थे। बाग के आसपास का सूनापन कई महीनों के लिए अदृश्य हो जाता था। किसी साल बंजारों का एक समूह उसी बाग में कुछ दिनों के लिए रुक गया। रोज रात को खाने के बाद वो अपने देशज वाद्ययंत्रों के साथ गाने बजाने का कार्यक्रम शुरू करते थे जिन्हें सुनने के लिए गाँव से भी बहुत से श्रोता आ जाते थे। एकाध हफ़्ते के बाद जब उनका दल अपना डेरा डंडा उजाड़कर वहाँ से अगले मुकाम के लिए रवाना हुआ तो जैसे पूरे बाग की रौनक ही अपने साथ ले गया। इतने दिनों तक जिस जगह देर रात तक रौशनी और लोक धुनों के सुर जुगलबंदी करते थे वही जगह अपने स्वाभाविक एकान्त में आकर डरावनी लगने लगी। इन दिनों को याद करते हुए आज लगता है कि हम सब भी इस दुनिया मे एक बंजारे की तरह ही तो रह रहे हैं। जिस दिन साँसों की गिनती पूरी हुई, डेरा उठा।

जुताई के लिए ट्रैक्टर और फसलों की मड़ाई के लिए थ्रेशर आने से बैल और खलिहान की परंपरा ही ख़त्म होती गयी। कम लागत और कम समय में अपने दरवाजे पर ही लोग मड़ाई का काम करने लगे। एक समय घर के बाहर जिन बैलों का होना ईर्ष्या और गर्व का विषय होता था वो अप्रासंगिक हो उठे। खलिहानों का दौर अतीत बन चला। जमीन का जो टुकड़ा साल के ज्यादातर महीनों में सोने सा चमकता रहता था आज गंदगी और उपेक्षा के कारण वीरान पड़ा है। वर्तमान पीढ़ी अपने हिस्से की जमीन के बारे में तो जानती है पर इसी हिस्से पर एक समय रौनक और जिंदादिली का पर्याय रहे खलिहानों को न जानती है न ही कल्पना कर सकती है।

उन दिनों जोगी इकतारा बजाते हुए भिक्षा माँगने आते थे जिन्हें तकरीबन हर घर से ससम्मान आटा, दाल और चावल मिलता था। कई साल पहले "मुँह-नोचवा" की अफ़वाहों का एक लंबा दौर चला था । प्रत्यक्ष दोषी तो कभी कहीं पकड़े नही गए पर हिंसक प्रवृत्ति के लोगों को उसी हल्ले में प्रतिशोध लेने का अच्छा मौका मिल गया। जाने कितने निर्दोष इस प्रतिहिंसा का शिकार बने , जिनमें जोगियों की जमात भी शामिल है। आज इकतारे की वो करुण आवाज सिर्फ़ पुराने लोगों के जेहन में शेष रह गयी है।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

वैविध्य और कल्पनाशीलता सृजन की एक अनिवार्य ज़रूरत है। एक ही तरह की किताब, धुन, या पेंटिंग से कोई कलाकार सफ़ल या लोकप्रिय भले हो जाय पर अपनी रचना- यात्रा में यदि वो क्रमशः विकास न करे तो कहीं न कहीं प्रश्नचिन्ह लग ही जाते हैं । पंचम दा में विविधता का ये गुण भरपूर था। उनके संगीत में इतने तरह के शेड्स हैं कि वो हमें हर बार हैरान कर जाते हैं। इसी अद्भुत प्रतिभा के कारण वो हमारे समय के सबसे बड़े संगीतकार बन गए। अभिनय में जो विशेषता संजीव कुमार में है संगीत में वही राहुलदेव बर्मन में। अनगिनत उदाहरणों में सिर्फ़ एक पर बात करें तो 1975 की दो सफल फ़िल्में- शोले और आँधी, दोनों में पंचम का संगीत पर दोनों की शैली इतनी जुदा कि उनकी इस खूबी से जो वाकिफ़ न हो उसके लिए यकीन करना नामुमकिन हो जाय। पाश्चात्य धुनों का भारतीयकरण भी उन्होंने इतनी खूबसरती से किया है कि श्रोता मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। अपनी छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने संगीत के इतने बेशकीमती मोती बिखेर दिए कि आज तक उनके चाहने वाले उन्हें चुन रहे हैं। रीमिक्स वालों की एक पीढ़ी तो उन्हीं के कारण जिन्दा है।

लता मंगेशकर की सुमधुर आवाज़ के साथ उन्होंने अपने सांगीतिक जीवन का आरंभ किया। " घर आजा घिर आये " जैसा बेमिसाल गीत ये सिद्ध करने को पर्याप्त था कि संगीत आकाश पर एक ऐसा सितारा उग चुका है जिसकी चमक अनंत काल तक बनी रहने वाली है। अपनी संगीत यात्रा के पहले चरण में उन्हें अपने दौर के सारे बड़े गायकों की आवाज़ का साहचर्य मिला। मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, किशोर कुमार, मन्ना डे, मुकेश, यसुदास, भूपेंद्र और सुरेश वाडकर जैसे बेहतरीन गायकों के स्वर और पंचम के सुर की जुगलबंदी खूब जमीं। आठवें दशक में खराब स्वास्थ्य के चलते डॉक्टर्स ने उन्हें संगीत से दूर रहने की सलाह दी। पर उनके लिए ये दूरी बनाये रखना सम्भव नही था। 1942 A Love Story में दिया गया संगीत उनकी अंतिम और यादगार धरोहर बन के रह गया। "कुछ न कहो " और "इक लड़की को देखा तो" जैसे मधुर गीतों पर कुमार सानू पूरे जीवन नाज़ कर सकते हैं। कविता कृष्णमूर्ति के हिस्से में भी इस फ़िल्म का एक बेहद सुंदर एकल गीत " प्यार हुआ चुपके से" आया।
27 जून को पंचम दा का जन्मदिन था। सुबह सुबह यूनुस भाई की Graffiti से ये जानकारी मिली। दिन भर ऐसी व्यस्तता रही कि न तो कुछ सुनने का संयोग बना न ही देखने का। इसी बीच मयूरेश जी की फेसबुक पोस्ट से मालूम पड़ा कि सोनी चैनल पर पंचम दा पर आधारित कोई कार्यक्रम आया जिसमें लता जी या उनके किसी गीत का ज़िक़्र नही था। ये पढ़कर उन्हीं की तरह मैं भी हैरान हुआ। क्या लता जी के ज़िक़्र के बग़ैर पंचम के संगीत पर कोई बातचीत पूर्ण हो सकती है?? मुझे तो असंभव लगता है।
इस तरह के विवाद पहले भी उठते रहे हैं। किसी साक्षात्कार में जब हृदयनाथ मंगेशकर से पूछा गया कि "आशा ताई का आरोप है कि पंचम दा ने अच्छे गीत दीदी को दिए और तेज धुन वाले गीत मुझे" तो उनका जवाब था कि-- " पंचम दा बहुत गुणी संगीतकार थे। उन्हें ये पता था कि किस गीत के साथ कौन सा गायक न्याय कर सकता था। "
ये उत्तर बिल्कुल सही था। उन्होंने इस बिंदु पर रिश्तों का ख़याल कभी नही किया ..। बहुत से गीत ऐसे भी हैं जो उस समय के नवोदित गायकों के हिस्से में आये। कई बार निर्माता के बजट और निर्देशक की योजना के हिसाब से भी चलना पड़ता है।
ये आरोप भी ग़लत है कि आशा भोंसले को उन्होंने अच्छे गीत नही दिए। "इज़ाज़त" के लाज़वाब गीतों को कौन भूल सकता है? "परिन्दा" जैसी हिंसा प्रधान फ़िल्म में भी सुरेश वाडकर और आशा भोंसले से उन्होंने दो ऐसे युगल गीत गवाए जो सर्वकालिक बेहतरीन प्रेम-गीतों की सूची में जगह रखते हैं.. पहला-- तुमसे मिल के ऐसा लगा तुमसे मिल के और दूसरा-- प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी।
ऐसे जाने कितने उदाहरण और होंगे।

लता जी के बेहद प्रिय सौ गीतों की सूची बनाऊँ तो उसमें यकीनन 20 से 25 गीत पंचम के होंगे। लता और पंचम के गीतों का जादू इस तरह है जैसे किसी खिले हुए फूल पर शबनम की एक बूँद ठहर गयी हो।
इस युगलबंदी के गीतों को याद करने लगा तो देखते देखते 21 गीत सामने आ गए। अलग अलग, तीसरी मंजिल, हम किसी से कम नहीं जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के बहुत से यादगार गीत अभी भी बाकी हैं।

घर आजा घिर आये-- छोटे नवाब
बीती न बिताई रैना-- परिचय
नाम गुम जाएगा-- किनारा
मीठे बोल बोले -- किनारा
अब के ना सावन बरसे -- किनारा
इस मोड़ से जाते हैं-- आँधी
तुम आ गए हो -- आँधी
तेरे बिना ज़िन्दगी से -- आँधी
रैना बीती जाय-- अमर प्रेम
बड़ा नटखट है-- अमर प्रेम
भोर भई पंछी धुन ये सुनाए-- आँचल
चोरी चोरी चुपके चुपके-- आपकी क़सम
करवटें बदलते रहे-- आपकी कसम
आजकल पाँव जमीं पर-- घर
सावन के झूले पड़े-- जुर्माना
ऐ री पवन-- बेमिसाल
जाने क्या बात है -- सनी
आपकी आंखों में कुछ-- घर
तेरे बिना जिया जाय न-- घर
सिली हवा छू गयी-- लिबास
खामोश सा अफसाना-- लिबास

जो मैंने जिया यादों के चिराग जलती हुई नदी कमलेश्वर प्रकाशक --- राजपाल  एंड सन्स बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न कमलेश्वर ने साहित्य , सिनेम...