बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

बदलता वक़्त-- रश्मि रविजा

"बदलता वक्त "

शाम होने को आयी थी. नीला आकाश सिन्दूरी हो चुका था। पक्षी कतार में चहचहाते हुए अपने घोंसले की तरफ लौट रहे थे । वातावरण में उमस सी थी। रत्नेश शर्मा घर के बरामदे पर कुर्सी पर बैठे हाथ में पकडे अखबार से अपने चेहरे पर हवा कर रहे थे। सुबह से अखबार का एक एक अक्षर पढ़ चुके थे .बहुत कुछ दुबारा भी . और कुछ करने को था नहीं. सोचे सड़क पर ही चहलकदमी कर आयें पर पहना हुआ कुरता पैजामा  धुल धुल कर छीज़ गया था । रंग भी मटमैला पड़ गया था। उन्हें उठ कर कुरता बदलने में आलस हुआ और कुरता बदलें भी क्यूँ , सिर्फ निरुद्देश्य भटकने के लिए । अब कोई उत्साह भी तो नहीं रह गया । पर एक समय था जब हर वक्त कलफ लगे झक्क सफ़ेद कुरते पैजामे में रहते थे। व्यस्तता भी तो कितनी थी। हर वक़्त किसी न किसी का आना-जाना लगा रहता था। कितनी योजनायें बनाने होती थीं । कितना हिसाब-किताब करना होता था। अब तो काम ही नहीं रह गया, वरना उनके जैसा कर्मठ व्यक्ति अभी यूँ खाली बैठा होता..

छात्र जीवन से ही वे एक मेधावी छात्र रहे। उनकी प्रतिभा देख रिश्तेदार,स्कूल के अध्यापक सब कहते कि वे एक बड़े अफसर बनेंगे। पर रत्नेश शर्मा की अलग ही धुन थी। उनके कस्बे में कोई स्कूल नहीं था। वे चार मील साइकिल चलाकर स्कूल जाते । गर्मी में स्कूल से लौटते वक्त दोपहर को भयंकर लू चलती ।सर पर तपता सूरज और नीचे गरम धरती । पसीने से तरबतर हो वे तेजी से पैडल मारते जाते। जाड़े के दिनों में सुबह स्कूल जाते वक्त ठंढी हवा तीर की तरह काटती । कानों पर कसकर मफलर लपेटा होता, पैरों में मोज़े पहने होते फिर भी ठिठुरते पैर साइकिल पर पैडल मारने में आनाकानी करते ।

वे हमेशा सोचते काश उनके कस्बे में ही स्कूल होता तो उन सबको उतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती। स्कूल के इतनी दूर होने की वजह से कई लड़के अनपढ़ ही रह गए । बहुत से माता-पिता अपने बच्चों उतनी दूर भेजना गवारा नहीं करते थे। कुछ बच्चे ही शैतान थे । वे घर से तो निकलते स्कूल जाने के नाम पर लेकिन बीच में पड़ने वाले बगीचे में ही खेलते रहते और शाम को घर वापस । दो तीन महीने बाद उनके माता-पिता को बच्चों की कारस्तानी पता चल जाती और फिर वे उन्हें किसी काम धंधे में लगा देते और स्कूल भेजना बंद कर देते। लड़कियों को तो माता-पिता स्कूल भेजते ही नहीं थे। जिन्हें पढने में रूचि होती वे अपने भाइयों की सहायता से ही अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेतीं और अपना नाम लिखना और चिट्ठी पत्री लिखना-पढना सीख जातीं। बस इतना ही उनके लिए काफी समझा जाता और उन्हें घर के काम काज,खाना बनाना,सिलाई-कढाई यही सब सिखाया जाता।

रत्नेश शर्मा के मन में स्कूल के दिनों से ही एक सपना पलने लगा कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने कस्बे में स्कूल खोलेंगे और वहाँ के बच्चों को शिक्षा प्रदान करेंगे। स्कूली शिक्षा के बाद उन्हें, उनके पिताजी ने शहर के कॉलेज में पढने के लिए भेजा। उनके साथ के सारे लड़के कॉलेज के बाद कोई नौकरी करने और फिर शादी करके शहर में ही बस जाने का सपना देखते । वे अपने कस्बे में वापस लौटने की सोचते भी नहीं। पर रत्नेश शर्मा का सपना बिलकुल अलग था .शुरू में उन्होंने अपने मित्रों से अपने मन की बात बतायी भी तो उनका मजाक उड़ाया जाने लगा। फिर उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। जब बी.ए. करने के बाद उन्होंने घर पर यह बात बतायी तो पिता बहुत निराश हुए। लेकिन रत्नेश शर्मा जब अपने विचारों पर दृढ रहे तो पिता ने भी उनका साथ दिया। उनका पुश्तैनी मकान बहुत बड़ा था और उतने बड़े मकान में बस रत्नेश शर्मा का ही परिवार रहता था। उनके चाचा शहर में नौकरी करते थे और वही मकान बना कर बस गए थे। उनकी एक बहन की शादी हो चुकी थी और इतने बड़े मकान में बस तीन प्राणी थे। मकान के एक हिस्से में उन्होंने स्कूल खोलने का निर्णय लिया।

जब कस्बे के लोगों ने उनका ये विचार सुना तो बहुत खुश हुए और सबने यथायोग्य अपना सहयोग दिया। तब जमान ही ऐसा था । पूरा क़स्बा एक परिवार की तरह था। किसी की बेटी की शादी हो , सब लोग मदद के लिए आ जाते। मिल जुल कर काम बाँट लेते। स्कूल के लिए भी कुछ ने मिलकर कुर्सियों और बेंचों का इंतजाम कर दिया। कुछ ने ब्लैकबोर्ड लगवा दिए। कुछ ने पेंटिंग करवा दी। अपने साथ ही एक दो मित्रों को उन्होंने स्कूल में पढ़ाने के लिए राजी कर लिया और इस तरह स्कूल की शुरुआत हो गयी। शुरू में तो बहुत कम बच्चे आये, पर धीरे धीरे रत्नेश शर्मा और उनके मित्रों की मेहनत रंग लाई। लगन से पढ़ाने पर उनके स्कूल के बच्चों का रिजल्ट बहुत अच्छा होने लगा और धीरे धीरे बच्चों की संख्या में बढ़ती गयी। लडकियाँ भी पढ़ने आने लगीं । आस-पास के कस्बों से भी बच्चे आने लगे । रत्नेश शर्मा सुबह से स्कूल की देखभाल में लग जाते और देर रात तक सिलेबस बनाते,बच्चों की प्रगति का लेखा-जोखा तैयार करते। पास के शहर से सामान्य ज्ञान की किताबें लाते। पढ़ाई को किस तरह रोचक बनाया जाए,इस जुगत में वे लगे होते।

चार साल निकल गए और इस बार दसवीं में इस स्कूल के आठ बच्चे थे।  बच्चों से ज्यादा रत्नेश शर्मा को परीक्षाफल की चिंता थी। जब रिजल्ट निकला तो आठों बच्चों को फर्स्ट डिविज़न मिला था और दो बच्चे मेरिट में भी आये थे ।  इस स्कूल के नाम का डंका दूर दूर तक बजने लगा. रत्नेश शर्मा का आत्मविश्वास और बढ़ा। स्कूल को अनुदान मिलने लगा। पास की जगह में नए कक्षाओं का निर्माण हुआ। बहुत से नए शिक्षक भी इस स्कूल में पढ़ाने को इच्छुक हुए। अब इस स्कूल के बच्चे आगे चलकर इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई करने लगे। जब उनका मेडिकल और इंजीनियरिंग में चयन हो जाता तो वे अपन पुराने स्कूल को नहीं भूलते और स्कूल में मिठाई का डब्बा लेकर जरूर आते। रत्नेश शर्मा की आँखें नम हो जाती,मन गदगद हो जाता और अपने छात्रों की सफलता पर सीना गर्व से फूल जाता ।

रत्नेश शर्मा की शादी हो गयी और नीलिमा उनकी जीवनसंगिनी बन कर आयीं। नीलिमा का गला बहुत मधुर था और वे चित्रकला में भी प्रवीण थीं। वे खुद बड़ी रूचि से स्कूल में संगीत और चित्रकला सिखातीं। समय के साथ वे जुड़वां बच्चों के माता-पिता भी बने। बेटे का नाम रखा राहुल और बेटी का रोहिणी।
स्कूल दिनोदिन प्रगति कर रहा था ।बीतते समय के साथ उनके कस्बे में अब नए नए दफ्तर और बैंक खुलने लगे थे। शांत कस्बे में अब भीड़-भाड़ होने लगी। जहाँ इक्का दुक्का कार हुआ करती थी वहीं अब ट्रैफिक जाम होने लगा। कस्बा शहर का रूप लेने लगा। गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं और वे स्कूल के अगले सत्र का सिलेबस बनाने में जुटे हुए थे। उनके कानों में उड़ती हुई खबर पड़ी कि पास के शहर के एक बड़े अंग्रेजी स्कूल की एक शाखा उनके कस्बे में भी खुलने वाली है। उन्हें ख़ुशी हुई कि अच्छा है। उनके स्कूल पर बहुत ज्यादा भार पड़ रहा था ।कुछ बच्चे उस स्कूल में चले जायेंगे। पर जब गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला तो उन्होंने पाया,उनके स्कूल के आधे बच्चे उस अंग्रेजी स्कूल में चले गए। नयी चमकदार बिल्डिंग थी। चमचमाता हुआ स्कूल। लोग इसी चमक-दमक के प्रलोभन में आ गए थे, पर उन्होंने ज्यादा फ़िक्र नहीं की । उन्हें यकीन था कि वे बहुत लगन से पढ़ाते हैं और उनके स्कूल का बोर्ड रिजल्ट भी अच्छा होता है। बच्चे मन से पढेंगे।

पर धीरे धीरे उनकी आशा निराशा में बदलती गयी। हर साल स्कूल के कुछ बच्चे उस स्कूल में चले जाते और उनके स्कूल में नए एडमिशन कम होने लगे । एक दिन तो राहुल भी जिद करने लगा कि मोहल्ले के सारे दोस्त अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं,वो भी वहीँ पढ़ेगा,अंग्रेजी में बोलना सीखेगा।  एक दिन उन्होंने बहाने से आस-पास रहने वाले और उस स्कूल में पढने वाले बच्चों को बुलाकर उनका टेस्ट लिया तो पाया कि बस ऊपरी चमक दमक ही है। बच्चों का मैथ्स और अंग्रेजी का व्याकरण बहुत ही कमजोर है। उस स्कूल का दसवीं का रिजल्ट भी अच्छा नहीं आया फिर भी लोगों को ज्यादा परवाह नहीं थी। बच्चा अंग्रेजी के दो-चार शब्द बोल रहा है, कड़क यूनिफॉर्म में बस में बैठकर स्कूल जाता है , यही देख लोग संतुष्ट हो जाते। खूब धूमधाम से वार्षिक प्रोग्राम मनाया जाता। लोग बताते , एक महीने से स्कूल में पढ़ाई नहीं वार्षिक प्रोग्राम की ही तैयारी चल रही है। शानदार स्टेज बनवाया जाता , किराए पर कॉस्टयूम ,नृत्य-गीत सिखाने वाले बुलाये जाते। खूब रौनक होती । जबकि उनके स्कूल में तो प्रांगण में ही उन्होंने एक सीमेंट का चबूतरा बनवा रखा था, जिसका स्टेज के रूप में प्रयोग किया  जाता। सारी तैयारी शिक्षक और बच्चे ही मिल कर करते। कपड़े भी बच्चे अपने घर से या आस-पड़ोस से मांग कर पहनते। नीलिमा की निगरानी में सारी तैयारी होती। रामायण के अंश , हरिश्चंद्र ,बालक ध्रुव की कथा का मंचन किया जाता । इतने छोटे बच्चों की अभिनय कला देख वे अभिभूत हो जाते । रंग बिरंगी साड़ियों का लहंगा पहन छोटी छोटी बच्चियाँ जब लोक नृत्य करतीं तो समाँ बँध जाता । पर उन्होंने सुना कि उस अंग्रेजी स्कूल में फ़िल्मी संगीत पर तेज नृत्य किये जाते हैं और आजकल के बच्चों को वही अच्छा लगता । राहुल अपने दोस्तों से सीख कभी कभी नीलिमा और रोहिणी के सामने वो डांस करके दिखाता । वे हँसी से लोट पोट होती रहतीं पर अगर उनकी आहट भी मिल जाती तो सब चुप हो जाते और राहुल वहाँ से चला जाता। वह अब कम से कम उनके सामने आता। उन्हें अपना बेटा ही खोता हुआ नज़र आ रहा था, पर वे दिल को तसल्ली देते कि उनका एक ही बेटा नहीं है। स्कूल के सारे छात्र उनके बच्चे हैं, उन्हें सबकी चिंता करनी है।

राहुल के अन्दर आक्रोश भरने लगा था और इसे व्यक्त करने का जरिया उसने अपनी पढ़ाई को बनाया। वह अपनी पढ़ाई के प्रति लापरवाह होने लगा।  रत्नेश स्कूल के काम में इतने उलझे होते कि नीलिमा के बार बार कहने पर भी राहुल पर विशेष ध्यान नहीं दे पाए। वहीं बिटिया रोहिणी बिना शिकायत किये उनके स्कूल में ही बहुत मन से पढ़ती। वे नीलिमा से कह देते , “रोहिणी भी तो राहुल की क्लास में ही है, उसे भी कहाँ पढ़ा पाता हूँ पर वो कितने अच्छे अंक लाती है।” नीलिमा कहती, “सब बच्चे अलग होते हैं ,उन पर अलग तरीके से ध्यान देने की जरूरत है।” पर स्कूल की चिंता में उलझे वे इस बात की गंभीरता को नहीं समझ पाए। रोहिणी दसवीं में भी मेरिट में आयी और राहुल सेकेण्ड डिविज़न से पास हुआ . अब शहर जाकर कॉलेज में एडमिशन कराना था । उनका बहुत मन था , दोनों बच्चों को होस्टल में रख कर पढ़ाएं ,पर अब पैसों की कमी बहुत खलने लगी थी । वे अपने वेतन का बड़ा हिस्सा भी स्कूल की जरूरतें पूरी करने में खर्च कर देते। नीलिमा उनकी मजबूरी समझती थी। उसने रोहिणी को शहर में रहने वाली अपनी बहन के पास भेजकर पढ़ाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने बहुत बेमन से हामी भरी। रोहन को कम से कम खर्चे में हॉस्टल में रह कर पढ़ाने का इंतजाम किया। उस पूरी रात वे सो नहीं पाए । अपने बच्चों के लिए वे उच्च शिक्षा और जरूरी सुविधाएं भी नहीं जुटा पा रहे हैं । वर्षों पहले लिया गया उनका निर्णय क्या गलत था ? उन्होंने भी नौकरी की होती तो आज ऊँचे पद पर होते और अच्छे पैसे कमा रहे होते। फिर उन्होंने सर झटक दिया , वे इतना स्वार्थी बन कर कैसे सोच सकते हैं ? इस स्कूल के माध्यम से कितने ही बच्चों को शिक्षा मिली, उनका जीवन संवर गया। अपने बच्चों के लिए विलासिता की कुछ वस्तुएं नहीं जुटा सके तो इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए ।

वक़्त गुजरता गया । उनका मन था रोहिणी भी पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर हो जाए तभी उसकी शादी करें । वो पढने में तेज थी ।कम्पीटीशन पास कर बड़ी अफसर बन सकती थी , पर फिर उनकी मजबूरी आड़े आ गयी। बी ए. के बाद राहुल ने दिल्ली जाकर पढने की इच्छा व्यक्त की और उन्हें उसे वहां भेजने के लिए पैसे का इंतजाम करना पड़ा। रोहिणी ने विश्वास दिलाया,उसके पास किताबें हैं। वो घर पर रहकर ही तैयारी करेगी। अचानक इसी बीच उनके एक पुराने मित्र ने अपने बेटे के लिए बिना किसी दान दहेज़ के रोहिणी का हाथ मांग लिया । नीलिमा ने उन्हें बहुत समझाया कि हमारे पास पैसे नहीं हैं और बिना पैसे के ही इतना अच्छा घर वर मिल रहा है। आपके मित्र हैं , बिटिया शादी के बाद भी पढ़ लेगी। रोहिणी ने भी निराश नहीं किया। अफसर तो नहीं बन पाई पर बी.एड की पढाई की और फिर शिक्षिका बन गयी। राहुल भी किसी प्राइवेट कम्पनी में है। अपने खर्च के पैसे निकाल लेता है । घर बहुत कम आता है, आता भी है तो उनसे दूर दूर ही रहता है। नीलिमा से ही उसके हाल चाल मिलते हैं।

धीरे धीरे उनके स्कूल में बच्चे बहुत ही कम हो गए। कुछ गरीब घर के बच्चे जो अंग्रेजी स्कूल की फीस नहीं दे सकते थे, बस वही आते। उनके स्कूल के शिक्षक भी ज्यादा वेतन पर उस अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने चले गए । बच्चे कम होते गए। फीस के रूप में होने वाली आय कम होती गयी। मरम्मत न होने से स्कूल की हालत भी खस्ता होती गयी। अब पहले वाली रौनक भी नहीं रही। अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को परवान चढ़ते और फिर यूँ धीरे धीरे बिखरते देख,रत्नेश शर्मा का ह्रदय रो देता। ऐसे ही बुझे मन से बैठे थे कि दरवाजे के सामने एक कार रुकी। उन्हें लगा कोई किसी का पता पूछ्ने आया है , वरना उनके यहाँ कौन आएगा। एक सज्जन अपने एक छोटे से बेटे के साथ उतरे और उनके घर की तरफ ही बढ़ने लगे। रत्नेश शर्मा उठकर कर खड़े हो गए । वे सज्जन उनके पैरों तक झुक आये और अपने बेटे से बोले -- “मास्टर जी को प्रणाम करो बेटा। आज जो कुछ भी हूँ इनकी पढ़ाई की वजह से ही हूँ।" फिर उनसे मुख़ातिब हुए-- "आपने पहचाना नहीं मास्टर साब। मैं जितेन हूँ। मेडिकल करने के बाद विदेश चला गया था। अब अपने देश लौटा तो सबसे पहले आपकी चरणधूलि लेने चला आया। मैंने अपने बेटे को आपके बारे में बहुत कुछ बताया है। कितनी मेहनत से आप पढ़ाते थे। शाम को अचानक हमारे घर आ जाया करते थे, ये देखने कि हमलोग घर पर पढ़ रहे हैं या नहीं।"
रत्नेश शर्मा की आँखें धुंधली हो आयीं । मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। उनका खोया आत्मविश्वास फिर से जागने लगा । वे दुगुने जोश से भर गए। जितने बच्चे हैं उनके स्कूल में, उन्हें मन से पढ़ाएंगे। किसी की ज़िन्दगी बना पायें इससे ज्यादा और चाहिए ही क्या उन्हें।

रचनाकार- रश्मि रविजा

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

प्रार्थना में पहाड़

साहित्य और इतिहास की इस जीवन जगत में क्या भूमिका है और अपने उत्तरदायित्व में ये कितने सफल हैं, इस पर टिप्पड़ी करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। इतना ज़रूर देखा और समझा है कि इतिहास महत्वपूर्ण घटनाओं और व्यक्तियों को ही वरीयता देता है, जबकि साहित्य उन बंद सुरंगों की भी खोज करता है जहाँ हाशिये पर पड़े हुए , इतिहास द्वारा उपेक्षित और नगण्य सिद्ध कर दिए गए व्यक्तियों या सभ्यता के अवशेष दबे होते हैं।
भालचंद्र जोशी का पहला उपन्यास " प्रार्थना में पहाड़" ( जो इसी वर्ष विश्व पुस्तक मेले के दौरान प्रकाशित हुआ) पढ़ते समय ये विचार प्रायः मेरी चेतना से टकराते रहे। उनकी लंबी कहानियों के पाठकों/ प्रशंसकों को इस उपन्यास की प्रतीक्षा लंबे समय से थी। यह ऐसी विधा है जो किसी भी कथाकार को स्थायित्व और उन्हें अपने भीतर छुपी हुई अनंत संभावनाओं को बाहर लाने का एक अवसर देती है।

इस उपन्यास का कथानक एक ऐसे आदिवासी क्षेत्र पर केंद्रित है जो दो पड़ोसी जनपदों खैरागढ़ और सम्बलपुर की सीमा पर स्थित है।
एक बहुत बड़े धनकुबेर मिस्टर बजाज की शराब फैक्ट्री का वेस्ट लिक्विड, जिसमें प्राणघातक अल्कोहल भी होता है, हर वर्ष बारिश के दिनों में नदी में छोड़ दिया जाता था और तेज बहाव में ये सारा लिक्विड बह जाता था। इस बार भी समय से बारिश आती तो किसी को पता न चलता। किन्तु इस बार अनुमानित तिथि पर वर्षा हुई नहीं और नदी का पानी इतना जहरीला हो गया कि इसके तट पर बसे हुए गाँव के अधिकांश मनुष्य और पशु मौत का शिकार बन गए। जंगल और नदी का किनारा लाशों से पट गया।
सूचना मिलते ही धनकुबेर और प्रशासन के बीच लेन देन की शाश्वत प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है, जिसमें दोनों जनपदों के कलेक्टर, विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। मालामाल होने के इस सुअवसर का लाभ सब उठाते हैं, सिवाय उस गाँव के जहाँ डेढ़ सौ की आबादी में बमुश्किल पच्चीस लोग बचे हैं और वो भी पीने के पानी के लिए तरसते हुए। मरे हुए जानवरों की सड़ती लाशों से उत्पन्न बीमारियाँ आये दिन किसी न किसी को अपने घातक पंजों में जकड़ रही हैं। बजाज अपने पी.ए. से कहता है कि "इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में सौ डेढ़ सौ मर भी जाएँ तो चिन्ता की क्या बात। बस, अपने बिजनेस पर कोई आँच न आये।" प्रशासन को भी सुदूर बसे इन आदिवासियों की कोई चिंता नहीं। रही सही कसर तब पूरी हो जाती है जब ये मालूम पड़ते ही कि जो गाँव अब तक इस जनपद की सीमा में था, नए परिसीमन में अब वह दूसरे जनपद में चला गया है, सारे गुनहगार निश्चिंत होकर बैठ जाते हैं।

दोनों निकटस्थ शहरों से इसकी दूरी क्रमशः100 और 150 किलोमीटर । इस बीहड़ रास्ते पर बीस से तीस किलोमीटर तक की पैदल यात्रा भी है जिसका कोई और विकल्प नहीं। आरम्भ में सम्बलपुर का पी.आर.ओ. कलेक्टर के आदेश पर कुछ पत्रकारों के साथ उस गाँव तक जाकर रिपोर्ट तैयार करता है और अगले दिन समाचारपत्रों में ये ख़बर प्रकाशित भी हो जाती है किंतु मीडिया वालों को एक शानदार पार्टी की दावत देकर इस खबर को यहीं ख़त्म कर दिया गया और आने वाले दिनों में इसके अलग अलग संस्करण अखबारों में छपते रहते रहे, जिनका आख़िरी लब्बोलुआब ये था कि आदिवासियों ने मरे जानवर नदी में फेंक दिए जिससे बीमारी फैल गयी।
इधर जिस अंधे कुएँ से थोड़ा थोड़ा पानी पीकर लोग किसी तरह जीवन और मृत्यु से जूझ रहे हैं, उसका पानी धीरे धीरे कम हो रहा है। प्रदूषित और संक्रामक माहौल के कारण बीमारियाँ इस कदर फैली हैं कि जीवित लोगों की संख्या भी निरंतर कम हो रही है। सेवानिवृत्त अध्यापक नंदू माटसाहब जो कुछ दिनों से बाहर थे, खबर पाते ही राशन की बोरियाँ उठवाकर इन लोगों के पास आ जाते हैं क्योंकि उन्हें इन के बीच ही अच्छा लगता है। इंसान अपनी उम्र चाहे जैसे दुखों में बिता ले किन्तु वह अपने आख़िरी दिनों को सुखद बनाना चाहता है।

अन्न और कुएँ के जल की मात्रा दिन ब दिन घट रही है।
एक दिन परस्पर सहमति बनती है कि कुछ लोग यहाँ से निकलकर थोड़े दिन कहीं नौकरी करें ताकि बचे हुए लोगों को जीवित रखने का कोई उपाय हो सके। नायक रतन अपने एक दो मित्रों के साथ बस्ती की तरफ रुख करता है। कॉमरेड परितोष जैसे ज़िंदादिल व्यक्ति से वहीं परिचय होता है रतन का, जो कहानी में आगे जाकर इस किताब के यादगार चरित्रों में शामिल हो जाते हैं।

इधर शतरंज की बिसात पर सारे मोहरे फिट हैं, किन्तु अचानक एक ट्विस्ट आ जाता है कहानी में जब एक बहुत बड़े अंग्रेजी अखबार का प्रसिद्ध पत्रकार समीर इसी तरफ़ का रुख करता है। बजाज अपनी खूबसूरत पी.ए. और अन्य भौतिक सुख सुविधाओं के जरिये इस नई समस्या को निबटाने में लग जाते हैं।
क्या समीर उस गाँव तक पहुँचकर वांछित तथ्यों को इकट्ठा करने में सफल हो पाता है? प्रशासन और अभियोगी पक्ष उसे रोक पाते हैं या नहीं? रतन कुछ पैसे जोड़कर अपने मित्रों के साथ पुनः अपने देस ( आदिवासी अपने गाँव को अपना देस ही कहते हैं) लौटता है या नहीं? भूख और प्यास से जूझते हुए गाँव के शेष लोगों के भाग्य में जीवन है या मृत्यु , इन प्रश्नों का उत्तर किताब पढ़ने के बाद ही मिल पायेगा। भालचन्द्र जोशी ने एक प्राचीन मिथकीय आख्यान का वर्तमान संदर्भों में पुनर्लेखन करते हुए जिस तरह इस उपन्यास के अंतिम अध्याय को समेटा है, वह यादगार है। पात्रों और स्थितियों के अनुरूप जिस सहजता से उनकी भाषा बदलती है वह इस रचना का मुख्य आकर्षण है। दृश्यों की संरचना हो, या किसी विषय पर उनका नजरिया, वे कहीं भी असंतुलित नहीं होते। एक दो ऐसे प्रसंग थे जो थोड़ी सी छूट पाकर साधारण बनकर रह जाते, किन्तु उनका निर्वाह ऐसी स्वाभाविक गरिमा से किया गया है कि वे अंश कथ्य की ताकत बन जाते हैं।
किताब पढ़ते समय बहुत से स्थानों पर रुककर उन्हें चिन्हित करना पड़ा। उन्हीं की एक बानगी नीचे प्रस्तुत है......

"आदमी खानपान से नहीं दुःख से बलवान बनता है।"

"संकट आता है तो सबसे पहले रिश्तों की तंग गलियों से निकलता हुआ , रिश्तों का इम्तहान लेने आता है।"

"कहते हैं कि मृत्यु आती है तो सबसे पहले उसकी आहट जानवर पहचान लेता है। वह मृत्यु से लड़ नहीं पाता और अपनी लाचारी में रोता है।"

"लोग कहते हैं कि इंसान उम्र के साथ सयाना होता है, दरअसल आदमी उम्र के साथ नहीं, जीवन में दुःखों के आने से सयाना होता है।"

"उम्मीद शब्द न होता तो दुनिया में आदमी किसके सहारे जीता? साहस और जोश के लिए भी पहले उम्मीद की उपस्थिति ज़रूरी है।"

"प्रायः लोग कहते हैं कि आदिवासी जाहिल, हिंसक और आक्रामक होते हैं लेकिन इतिहास उस समय की क्रूरता उन्हें विरासत में देकर जाता है। असीम यातनाएँ, असंख्य दुःख और समय का क्रूर बर्ताव उन्हें एक अनाम क्रोध और अजानी आक्रामकता से भर देते हैं।"

"दुख का भार आदमी सह लेता है, लेकिन सपनों का मर जाना दुनिया के सबसे आत्मीय का मर जाना होता है।"

"अतीत इतना चतुर होता है कि ठीक मार्मिक अवसर पर प्रकट होता है और मन के दरवाजों पर दस्तक देता है।"

"जीवन बहुत अजीब होता है। जो माँगो यह देता तो है लेकिन माँगने वाले की इच्छा से नहीं, अपनी शर्तों पर।"

"धर्म का ग़लत सिरा पकड़ में आ जाये तो आदमी कुटिल हो सकता है, लेकिन आस्थाएँ सिर्फ़ अच्छा मनुष्य बने रहने में मदद करती है।"

प्रार्थना में पहाड़ ( उपन्यास )

Bhalchandra Joshi

प्रकाशक- आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
Desh Nirmohi
पंचकूला, हरियाणा

बदलता वक़्त-- रश्मि रविजा

"बदलता वक्त " शाम होने को आयी थी. नीला आकाश सिन्दूरी हो चुका था। पक्षी कतार में चहचहाते हुए अपने घोंसले की तरफ लौट रहे थे । वाताव...