सोमवार, 14 मई 2018

ये दिन वे दिन एवं बरगद की छाँव में

ये दिन....वे दिन

और

बरगद की छाँव में

उषा भटनागर के कहानी संग्रह " ये दिन वे दिन" के फ्लैप पर सूर्यबाला जी लिखती हैं कि " कथा लेखन उषा जी के लिए कोई कैरियर नहीं, सिर्फ़ केनवास पर चलते उनके ब्रश और कलम के बीच की आवाजाही है।"
इसी पृष्ठ पर सुधा अरोड़ा जी कहती हैं-- "जब रेखांकन उनके मन की व्यथा को उकेरने में अधूरा लगने लगता है संभवतः तभी वह शब्दों की शरणस्थली में जाती हैं।"

उषा भटनागर जी की कहानियों में उनकी पेंटिंग्स की ही तरह एक विशिष्ट सी चित्रात्मकता दिखाई देती है। जिस तल्लीनता से वो अपनी तस्वीरों में रंग भरती हैं उसी सहजता से अपनी कहानियों के पात्रों और घटनाओं को चित्रित करते हुए उनमें जीवन के विविध रंगों का समावेश करती हैं।

"स्पीड ब्रेकर" कहानी का चौंकाने वाला अंत और भयावह सच हो, या
प्रयाग मेले में बेटे और बहू द्वारा छोड़ दी गयी माँ की इस अमानवीय अवहेलना से पैदा हुई जिजीविषा को दर्शाती अद्भुत कहानी "हम जिंदा हैं!"
जीवन के उत्तरार्ध में हाथों से धीरे धीरे खिसकते अधिकार को अनुभव करती माँ की विवशता का बयान करती "काँसे का थाल", हो  या
"रास्ते में" कहानी का वह गरीब युवक जो अपने परिजनों के लिए अरसे से एक एक कर जुटाए सामान को बैग की अदलाबदली में खो चुका है, बनावटीपन से दूर उनकी सरल किन्तु सशक्त भाषा और उतना ही सहज प्रस्तुतिकरण पाठकों को अद्भुत पाठकीय सुख देता है। कई दशकों का सफर तय कर चुकी उषा भटनागर जी की रचना यात्रा हमें एक ही साथ आनंदित और विस्मित करती है।

दोनों संग्रहों में ऐसी कितनी ही कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़ते हुए हम निरायास उनके पात्रों के दुख सुख के सहभागी बनते जाते हैं। कल्पना और हकीकत की वही दही और जामन जितनी मात्रा !
उनकी कहानियों की रचनाभूमि और इनके किरदार स्वाभाविक और जानेपहचाने से लगते हैं क्योंकि इनके सृजन की प्रेरणा प्रायः वास्तविक घटनाओं और जीवन में शामिल चरित्रों से प्राप्त हुई है।

आजकल चित्रकला के प्रति ज्यादा सहज और सक्रिय उषा जी की इन किताबों को पढ़ते हुए ये सोचकर अफ़सोस होता रहा कि इन दिनों उनका लिखना लगभग बंद है।
वे सूर्यबाला जी और मालती जोशी जी की उस परंपरा की कथाकार हैं जिनकी कहानियों की प्रासंगिकता और पठनीयता समय के किसी भी परिवर्तन से परे अक्षुण्ण रहती है।

बहुत बहुत धन्यवाद उषा जी!! आपने इन किताबों को पढ़ने के लिये उपलब्ध कराया। वो बारिश का दिन याद आ रहा है, जब गौरैया चावल बीनने के लिये नीचे नहीं उतर पा रही थीं और उस दुख को यहाँ साझा किया तो उसी पोस्ट पर आपसे भेंट हुई। संयोग इसी तरह निर्मित होते हैं वरना हमें परस्पर परिचित होने में जाने कितना वक़्त लग जाता।

अग्निपंखी- सूर्यबाला

सूर्यबाला जी उन चुनिन्दा रचनाकारों में हैं जिन्हें पढ़ते हुए पिछले चालीस वर्षों के दौरान कई पीढ़ियाँ बड़ी हुई हैं।

ग्रंथ अकादमी दिल्ली से प्रकाशित "अग्निपंखी" सूर्यबाला जी के दो लघु उपन्यासों का संग्रह है। पहला- 'अग्निपंखी' और दूसरा- 'सुबह के इंतज़ार तक'।

"अग्निपंखी" हमारे गाँवों की उस अभिशप्त पीढ़ी की कथा है जो अपनी जड़ों से विस्थापित होने और जीवन की विषमताओं की चक्की में निरंतर पिसने को बाध्य है।
कहानी के मुख्य पात्र जयशंकर के बचपन में ही उसके पटवारी पिता की मृत्यु हो जाती है। जयशंकर की माँ अपने दिवंगत पति की इच्छा पूरी करने के लिए बेटे की पढ़ाई और उसके सफल होने की हरसंभव कोशिश करती है। अपने ताऊ और चाचा के एहसानों और उनकी पत्नियों के व्यंग्य बाणों को झेलते हुए कई वर्षों की पढ़ाई के बाद जब नौकरी पाने के उसके तमाम प्रयास असफल हो जाते हैं तो जयशंकर का पहले से अंतर्मुखी स्वभाव और चिड़चिड़ा होता जाता है।
एक दिन वह घर छोड़कर मुम्बई चला जाता है। जिस शहर में फुटपाथ पर रात बिताने के लिए भी स्थानीय गुंडों को हफ़्ता देना पड़ता हो, वहाँ एक बेरोजगार व्यक्ति इस फुटपाथ पर सोने का भी अधिकारी नहीं रह जाता। इस समस्या से उबरने के लिए जयशंकर वाचमैन की नौकरी करने लगता है। सूर्यबाला जी इस विडंबना का वर्णन मर्मस्पर्शी शब्दों में करती हैं....

"उसके सामने विकल्प एक ही था-- खाये या सोए। और भूखे पेट नींद भी भला कहाँ आती है। इसलिए उसने पेट में अन्न डाल, जागना पसन्द किया।"

थोड़े दिनों बाद उसे किसी मिल में मजदूर की नौकरी मिल जाती है और रहने के लिए एक झोपड़पट्टी में घर। डेढ़ साल बाद जयशंकर पहली बार गाँव वापस जाता है और खूब  तड़क भड़क और दिखावे के साथ। इसके पीछे हमारी वही मध्यवर्गीय मानसिकता है जो हमें अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने की बजाय छद्म जीवन जीने को बाध्य करती है। थोड़े दिनों बाद उसका विवाह हो जाता है और वह अपनी पत्नी के साथ पहले की तुलना में थोड़ा आरामदायक जीवन बिताने लगता है।
गाँव घर के अन्य लोगों की भाँति उसकी माँ भी यही सोचती है कि जयशंकर किसी बड़ी नौकरी और बेहतर हालात में है। जेठानी और देवरानी के निरन्तर तानों और जीवन की एकरसता से ऊबी हुई माँ के मन में बेटे के पास जाकर रहने की स्वाभाविक इच्छा जाग उठती है। जयशंकर कई अवसरों पर टाल मटोल करने में सफल हो जाता है किन्तु आखिरकार एक बार माँ के जिद पकड़ लेने पर उन्हें अपने साथ
लाना ही पड़ता है। एक छोटी सी कोठरी में जहाँ पति पत्नी के लिए भी जगह कम पड़ती हो, एक तीसरे व्यक्ति का प्रवेश उन दोनों को अखर जाता है। माँ मुम्बई पहुँचकर जितना बेटे की हक़ीक़त से आतंकित है उतना ही उन दोनों की उपेक्षा से भी त्रस्त।
कहानी का उत्तरार्द्ध अत्यंत दुखद है और पाठक की सहानुभूति जयशंकर से हटकर उसकी माँ पर केन्द्रित हो जाती है जो गाँव से शहर तक परिजनों की अवहेलना और अपमान सहते सहते मानसिक बीमारी की शिकार होती जाती है।
इस निहायत गम्भीर और घोर यथार्थवादी विषय को सूर्यबाला जी अपनी समर्थ भाषा से पठनीय बनाने में सफल हुई हैं। उनके शब्दों की जादूगरी कहीं कहीं बरबस ध्यान खींच लेती है.... कहानी के आरंभ में ही जयशंकर के पिता के बारे में हो रही चर्चा का ये अंश देखिए....

"शहरियों के बीच उठने बैठने की वजह से ज़बान चलाने के कायदे भी जानता है। कहाँ चाबुक की तरह सटकारनी है और कहाँ गिलौरी की तरह मुँह में दबा लेनी है, खूब समझता बूझता है।"

** सुबह के इंतज़ार में **

यह लघु उपन्यास एक ऐसी युवती की दारुण आत्म-गाथा है जिसके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। यहाँ भी मध्यवर्गीय नैतिकता की वही समस्या, जहाँ हालात निम्न-मध्यवर्ग से भी बदतर, दयनीय, किन्तु ऊपर से सफेदपोश और इज्जतदार दिखने के असफल प्रयास प्रतिदिन की जद्दोजहद है। एक दिन इस युवती का भाई बुलू स्कूल से घर लौटकर चाय रोटी लेकर नाश्ता करने बैठता है। थोड़ी देर तक उसके माँ बाप असहाय नज़रों से एक दूसरे को देखकर अंत में उससे कहते हैं कि आजकल पढ़ाई लिखाई में कुछ नहीं रखा। आशंकित और बेटे का रोटी खाता हाथ थम जाता है और वो अनुरोध करता है कि कम से  दसवीं की फाइनल परीक्षा तो देने दें। किन्तु वो लोग किसी गैराज पर उसके काम करने की बात पहले ही निश्चित कर चुके होते हैं और कहते हैं कि दसवीं की परीक्षा तो बाद में कभी भी दी जा सकती है। लड़का यह सुनकर और कातर हो उठता है कि दूर होने के कारण उसे रहना भी उसी गैराज में ही पड़ेगा। एक बहन के शब्दों में बताए जा रहे इस दुखद प्रसंग को सूर्यबाला जी ने बड़ी अर्थपूर्ण मार्मिकता से उकेरा है।

भाई के चले जाने के थोड़े दिन बाद ही रिश्ते के एक मामा मामी मिलने आते हैं। मामी उसकी माँ से कहती हैं कि उसे उनके साथ भेज दें ताकि  वो उनके साथ रहकर थोड़ा कामकाज और तौर तरीके सीख ले और वो उसकी शादी की कोशिश भी करेंगी। माँ उसे समझा बुझाकर उनके साथ भेज देती है।
मामा किसी फैक्ट्री में सुपरवाइजर थे। ऊपरी कमाई के चक्कर में उनकी सेटिंग ठेकेदारों आदि से थी । कभी कभी कुछ कर्मचारी मिट्टी का तेल, शक्कर या कोयले जैसी चीजें घर पहुँचा जाते थे। एक ऐसे दिन जब घर पर कोई नहीं था, इन्हीं में से एक दबंग और हट्टा कट्टा शख़्स घर पर कुछ पहुँचाने के बहाने आता है और उसके साथ शारीरिक दुष्कर्म करता है। लड़की वापस अपने घर भेज दी जाती है। माँ बाप को लगातार चिंतित और घुलते हुए देखकर वो अपने भाई के साथ मिलकर घर छोड़ने का निर्णय लेती है। इस निर्णय के पीछे एक और कारण ये भी था कि वो भाई की छूट चुकी पढ़ाई को वापस शुरू कराने और उसे सफल बनाने के प्रति पहले से ही कटिबद्ध थी।

यहाँ से दोनों भाई बहन एक नए जीवन संघर्ष में व्यस्त हो जाते हैं। बहन उसका फिर से एडमिशन कराती है और लोगों के घरेलू कामों को करते हुए किसी तरह जीवन यापन करने की कोशिश में लग जाती है। उनके इस कठिन सफर में कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं जिनके भीतर का इंसान कभी नहीं मरता और जो असहाय लोगों की हर सम्भव सहायता या मार्गदर्शन करने में आनन्दित होते हैं।

कहानी में आगे चलकर कुछ सुखद और ज्यादातर दुखद प्रसंग ही आते हैं। हालाँकि सूर्यबाला जी ने आख़िरी पृष्ठों पर बड़े तार्किक ढंग से दुखान्त को थोड़ा बेहतर और सहनीय बनाने का प्रयास किया है।

ऐसे अवसाद उत्पन्न करने वाले कथानकों को पठनीय बनाना उनके आत्मीय लेखन से ही सम्भव हो पाता है। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनके चार उपन्यासों में केवल "मेरे संधिपत्र" ही ऐसा दिखता है जिसे मैं दुबारा पढ़ सकूँ। दीक्षांत और ये दोनों उपन्यास ऐसे हैं जिन्हें कभी दोहराने की हिम्मत शायद ही जुटाना सम्भव हो और यही उनके लेखन की जीत है।

अग्निपंखी
सूर्यबाला
ग्रन्थ अकादमी दिल्ली
पृष्ठ- 163
मूल्य - 200

जीवनपुरहाट जंक्शन- अशोक भौमिक

"ज़िन्दगी एक जैसी शक्ल में सबसे नहीं मिलती और वक़्त के गुजरने के साथ साथ उसके मायने भी बदलते रहते हैं। जिसे कभी एक छोटा सा हादसा समझकर बगल से निकल गए थे, आज बरसों बाद जब उसकी याद आती है तो मालूम पड़ता है कि उस छोटी सी बात के भीतर कितनी बड़ी कहानी छुपी हुई थी, जिसे तब देख ही नहीं पाया था।"

ऐसी ही छोटी छोटी घटनाओं के पार्श्व में छुपी हुई बड़ी कहानियों पर आधारित स्मृति आख्यानों के संग्रह "जीवनपुरहाट जंक्शन" के पहले अध्याय "इंटरव्यू" में ये स्वीकारोक्ति है अशोक भौमिक की! इसी अध्याय में आगे किसी जगह अपने बारे में बड़ी मासूमियत से वे कहते हैं----

"बीसवें दशक की दहलीज से निकल कर इक्कीसवीं के सफर पर निकले एक नौजवान को दुनियादारी के विश्वविद्यालय में दाखिला मिला था- 1974 में।  सोचा था सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो दो चार साल में जीवन की सही समझ आ जायेगी मुझे। पर ज़िन्दगी इतने खूबसूरत रंगों को साथ लिए मुझसे मिलती रही कि उसे समझने का वक़्त ही नहीं मिला। दुनियादारी के सवालों ने परेशान करना चाहा, पर मुझे कहाँ वर्तमान में जीना था, जो मैं उन पर सोचता। मैंने सपने देखे , खूब सारे सपने! हमारी उम्र बढ़ती जाती है , साथ के साथी छूटते जाते हैं और वक़्त बालू की मानिन्द हाथ की मुट्ठियों से सरकता जाता है पर सपने साथ नहीं छोड़ते। जुलूस बनकर साथ चलते रहते हैं। शहर बदला, घाट बदले, सफ़र बदला, हमसफ़र बदले। मैं दुनियादारी की पाठशाला में बैठे बैठे पाठशाला की दीवार पर फासिल बन गया, पर दुनियादारी का पहाड़ा नहीं रट पाया। पुरखों ने ताले दिए थे ढेर सारे, चाबियाँ बनाना भी खूब सुन्दर सीखा मैंने, बस किस ताले में कौन सी चाभी लगती है, इसी का इल्म नहीं हुआ मुझे। सो आज तक मैं निहायत ग़ैर ज़रूरी ताले चाभियों का जो बोझ ढो रहा हूँ, उन्हीं में से कुछ आप सबसे बाँट रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि ऐसा करने से यह बोझ हल्का होने वाला नहीं।"

इन पंक्तियों को पढ़ते समय मैं सोच रहा था कि अगर उन्होंने ज़िन्दगी को समझ लिया होता तो क्या आज हमारे सामने वो अशोक भौमिक होते जिन्हें इतने ढेर सारे लोग इतनी सारी मोहब्बत करते हैं। और फिर ये किताब भी कहाँ होती... क्योंकि इस संक्रमण काल में जीवन को समझ लेने का दावा करने के बाद ऐसी संवेदनाओं की जाने कितनी अहमियत शेष रहती हो! इस सृष्टि में सौंदर्य, मासूमियत और विश्वास जैसी शय कुछ इस तरह की नासमझियों की बदौलत ही शायद बची रह सकती हों !

"जीवनपुरहाट जंक्शन" में कुल बाइस स्मृति आख्यान हैं, जिनमें से कुछ "नया ज्ञानोदय" में लगभग एक वर्ष तक नियमित प्रकाशित होकर पाठकों तक पहले ही पहुँच चुके हैं। इस धारावाहिक श्रृंखला के समय किसी ने मुझसे प्रश्न किया था कि "संस्मरण और स्मृति-आख्यान में क्या अंतर है।"
इन दोनों विधाओं का शास्त्रीय भेद तो विद्वान लोग ही जानते होंगे। मुझे लगता है कि संस्मरण लिखते समय रचनाकार का ध्यान पात्रों , तथ्यों और घटनाओं की प्रामाणिकता पर अधिक रहता होगा जबकि स्मृति आख्यानों में कई घटनाएँ मिलकर एक घटना में तब्दील हो जाती हैं। एक कहानी का पात्र दूसरी कहानी के पात्र से जुड़ जाता है। चूँकि इन आख्यानों में कोरी कल्पना नहीं होती अतः इन्हें कहानी न कहकर स्मृति आख्यान कहते हैं।

अपनी स्मरणीय भूमिका (जिसे पहले ही इस मंच पर साझा किया जा चुका है) के साथ ही अशोक भौमिक हमें जीवनपुरहाट जंक्शन में प्रवेश करा देते हैं और इन बाइस आख्यानों की यादगार पाठकीय यात्रा के दौरान ऐसे किरदारों से पाठकों की भेंट होती है जो बरबस हमारी स्मृतियों का स्थायी हिस्सा बनते जाते हैं। अशोक भौमिक की तस्वीरों में ज़िन्दगी के जितने रंग दिखाई देते हैं उससे कहीं ज्यादा इन कहानियों में। इस किताब में शामिल इन स्मृति-आख्यानों में ज़िन्दगी इस कदर साँस लेती है कि काग़ज़ के पन्नों पर लिखी हुई तहरीर अचानक उनकी तस्वीरों की तरह ही हमारे सामने जीवन्त हो उठती है। मर्म और संवेदना का एक अद्भुत संयोजन जिसकी गूँज बड़ी देर तक जेहन मे कायम रहती है।

"सुरजीत" के मुख्य किरदार
को चौरासी के सिख विरोधी दंगों के समय इनके बॉस वीरेन दा कई दिनों तक एक होटल में छुपाकर बचाने में सफल होते हैं । कई दिनों बाद जब शहर की हालत थोड़ी बेहतर होती है तो एक दिन होटल में ही नाई लाकर उसके केश कटवाते हैं। उसे उसके घर बरेली छोड़ने के लिए रवाना होने से पहले अशोक जी को अलग बुलाकर बताते हैं कि 31 अक्टूबर को ही उसके दो भाइयों को दंगाइयों ने जिन्दा जला दिया था। लौटते समय शेर-दिल सुरजीत का उनके गले लगकर रो पड़ना मानवता के असमर्थ और उन्माद के अमानवीय चेहरे को अनावृत कर जाता है।

"आंटी जी" नामक आख्यान में प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी एक महिला की पाक मोहब्बत है, जो एक लम्बी दूरी तय करके आख़िरी साँसें गिन रहे अपने अविवाहित प्रेमी से मिलने
पहुँचती है। मृत्यु शय्या पर पड़े उस शख़्स की बहन और आंटी की परस्पर समझ और अनुराग के क्षण भी मार्मिक बन पड़े हैं।

"शरफुद्दीन" एक ऐसे गरीब किन्तु खुद्दार और ईमानदार शख़्स की स्मृति कथा है जो एक डाकबंगले का चौकीदार है। उसकी जवान बेटी का शव पाँच घंटों तक फर्श पर पड़ा रहा और वो उन मेहमानों के स्वागत सत्कार में लगा रहा जो उसकी नज़र में भगवान जैसे होते हैं। इन मेहमानों में अशोक भौमिक और उनका धूर्त एवं मक्कार मित्र चंद्रमोहन है जो सेवा में लगे शरफुद्दीन को अपनी बेहूदी माँगों से लगातार परेशान रखता है और उसे बेईमान भी बताता चलता है। देर रात जब चंद्रमोहन सो चुका होता है और अशोक भौमिक अपनी देर तक जागते रहने की आदत से लाचार तब उन्हें शरफुद्दीन के घर की तरफ़ से आ रहे रोने के हल्के स्वरों को सुनने के बाद इस विडंबना का पता चलता है। पाँच घंटों बाद शरफुद्दीन अब अपने बेटी की मिट्टी की तैयारी शुरू कर पाता है।
अगले दिन जो माली इन्हें पहुँचाने स्टेशन जाता है वो एक पर्ची और कुछ रुपये वापस लौटाता है। पर्ची में पिछली रात खाने की व्यवस्था के लिए दिए गए पचास रुपयों का हिसाब किताब होता है। अशोक भौमिक उस पर्ची को अपने पढ़े लिखे तथाकथित सभ्य मित्र को थमाते हुए सोचते हैं कि "हिसाब की इस पर्ची में हमारी मक्कारियों का हिसाब कहीं भी दर्ज़ नहीं था।"

"चौकीदार" हरिराम नामक आजाद हिंद फौज के एक ऐसे सिपाही की दास्तान है जो आजादी के बाद अपनी जीविका चलाने के लिये चौकीदारी करने पर मजबूर है। अशोक भौमिक अपने आजमगढ़ प्रवास के समय प्रायः देर रात तक जागते रहते थे और उनसे प्रायः हरिराम की मुलाकात हो जाती थी। कभी कभी देर रात स्टेशन जाकर हरिराम इनके लिए सिगरेट आदि भी ले आया करते थे। वो कहते हैं कि जिस दिन मुझे हरिराम की वास्तविकता मालूम पड़ी उसके बाद कभी उनसे सिगरेट मँगाने की हिम्मत नही पड़ी।

एक बेटे द्वारा जायदाद के लिए अपनी माँ के साथ किये गए अविश्वसनीय से लगते छल की कथा कहती है "जायदाद"... माँ भी ऐसी जिसके लिए कोई अजनबी नहीं था। शहर के उन अधिकांश युवाओं को उनका स्नेह और पार्टी मिलती रहती थी जो अपने घर से दूर इस शहर में रह रहे थे।
विदेश में बस गया उनका इकलौता उच्चशिक्षित बेटा सुकुमार बोस अपनी माँ को विदेश ले जाने का छलावा देकर यहाँ की सारी संपत्ति बेच देता है और माँ को दिल्ली हवाई अड्डे पर छोड़कर फ़रार हो जाता है। जिन सज्जन को वो घर बेचा गया था, उन्हीं को माँ फ़ोन करती है। अगली फ्लाइट से वो दिल्ली जाते हैं और उन्हें वापस लाकर घर में उसी तरह रखते हैं जैसे वो पहले रहा करती थीं। किन्तु इस घटना के बाद उनकी जिजीविषा ख़त्म हो जाती है और थोड़े दिनों में ही उनका देहान्त हो जाता है। डॉक्टर से जब ये पूछा जाता है कि वो बीमार तो थी नहीं फिर कैसे अचानक ये सब हो गया तो उसका जवाब था कि " शी डाइड ऑफ इंसल्ट "
अपने ही संतान द्वारा अपमानित एक माँ के अंत का कितना अर्थपूर्ण विश्लेषण है ये!

प्रेमचन्द की अमर कहानी ईदगाह के हामिद की याद दिलाते एक छोटे से मासूम बच्चे की कहानी "छोटा हामिद" हमें लखनऊ के उस दौर में ले जाती है जब साठ के दशक में वहाँ ऐसी बाढ़ आयी थी जिसनें जाने कितने घरों का अस्तित्व ही मिटा दिया था। ये छोटा बच्चा अपनी माँ के साथ नाना के घर शरण पाता है। उसकी माँ एक छोटे से बस्ते में दैनिक उपयोग की छोटी छोटी वस्तुएँ और उसकी जेब में उनकी रेट लिस्ट रख देती थी। भौमिक साहब के पिताजी उन दिनों लखनऊ में थे। इन्हीं के बरामदे में वो हामिद आकर अपनी दुकान लगा देता था और दोपहर में अपने छोटे से टिफ़िन की रोटियाँ खाकर सो जाता था। बरसों बाद एक बड़े डॉक्टर के सामने बैठे हुए अशोक भौमिक को बातचीत के दौरान जब ये पता चलता है कि डॉक्टर का बचपन उसी मोहल्ले में बीता है तो वो समझ जाते हैं कि वो छोटे हामिद ही आज के ये डॉक्टर हैं किंतु उनके आरंभिक कोच की एक सीख कि---"मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव और डॉक्टर के बीच एक मेज होती है, एक रिप्रेजेन्टेटिव को ये कभी नहीं भूलना चाहिए।" उनके और डॉक्टर के बीच आ जाती है।

अशोक भौमिक ने अपने इन आख्यानों के जरिये उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और आसपास के अन्य क्षेत्रों के कई दशकों के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को बेहद यादगार और शानदार तरीके से याद किया है। समाज से धीरे धीरे लुप्त होती जा रही देशज परम्पराओं और पारस्परिक सम्बन्धों की अनेक छटाएँ इन स्मृति कथाओं के बहाने ताजा हो उठी हैं।
हमें मालूम है कि उनकी यादों के खजाने का ये बहुत छोटा सा हिस्सा हमारे सामने आया है। जीवनपुरहाट जंक्शन के अगले खंड की प्रतीक्षा के साथ उन्हें सादर हार्दिक शुभकामनाएँ!
और चलते चलते इस किताब की भूमिका से ये छोटा सा प्रिय अंश....

" जो लोग दूसरों की आँखों में तकलीफ़ के उमड़ते समन्दर को देख पाते हैं और यकीन करते हैं कि इस दुनिया को जितनी जल्दी हो सके , बदल देना चाहिए- मैं उन लोगों पर ईश्वर से ज्यादा यकीन करता हूँ।"

जीवनपुरहाट जंक्शन
अशोक भौमिक
प्रकाशक-- भारतीय ज्ञानपीठ
वर्ष-- 2017
मूल्य- ₹ 300

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

बुरी औरत हूँ मैं-- वंदना गुप्ता

वंदना गुप्ता की पहचान मूलतः एक कवियित्री के रूप में है किन्तु गद्य की अन्य विधाओं मसलन कहानी , उपन्यास, आलोचना, व्यंग्य आदि में भी उनका खासा दखल है।
"बुरी औरत हूँ मैं" उनका पहला कहानी संग्रह है जो 2017 में ए.पी.एन. पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। हालाँकि व्यक्तिगत रूप से यह शीर्षक मुझे ठीक नहीं लगा, पर क्या किया जाय। आजकल सनसनीे का दौर है। सनसनी आवश्यक है, चाहे ये शीर्षक द्वारा उत्पन्न हो , चाहे किसी आवरण द्वारा। वैसे इस किताब का  आवरण बहुत बढ़िया है, जिसे मशहूर चित्रकार कुँवर रवींद्र ने बनाया है।
शीर्षकों पर जब हम बात करते हैं तो हमें इससे जुड़े दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए। आकर्षक शीर्षक वाली किसी किताब में यदि कहानी का मूल तत्व गायब हो और अन्य सभी चमत्कारिक तत्व हों भी तो पाठक के किस काम के।

वंदना जी के इस कहानी संग्रह में कुल बीस कहानियाँ हैं। कथ्य के लिहाज से एक दो कमजोर कहानियों को छोड़कर अधिकांश रचनाएँ अलग अलग विषयों और पात्रों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कुछ प्रेम कहानियों की मूल थीम में भी थोड़ा सा दोहराव जैसा लगा। बावजूद इसके अधिकांश किस्सों में व्याप्त किस्सागोई की विविधता ये दर्शाती है कि रचनाकार अपने आसपास हो रही घटनाओं और चरित्रों को कितनी सजगता और सूक्ष्मता से ग्रहण करने में सक्षम है। किसी भी कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक उन्हीं कहानियों को चुन लेते हैं जो उन्हें कहीं से विशेष लगें या प्रभावित करें। मैं भी उन कहानियों पर ही बात करना उचित समझता हूँ जो बेहद उल्लेखनीय लगीं।

संग्रह की पहली कहानी "ब्याह" एक ऐसी नारी की कथा है जिसका विवाह एक नपुंसक व्यक्ति से हो जाता है। नायिका दुर्भाग्य के इस अध्याय को अपनी नियति मानकर उस घर में शान्ति और सद्भाव से रहने का प्रयास करती है। घर के सदस्यों को एक लड़की के भविष्य खराब करने पर कोई पश्चाताप नहीं है। यहाँ तक कि उसकी सास अपने बेटे की कमी को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए अपने पति यानी नायिका के ससुर को रात उसके कमरे में भेजने से गुरेज नहीं करती।
झूठ और छल के सहारे की गयी बहुत सी निरर्थक और विवादित शादियों की स्मृति इस कहानी के साथ ताजा हो आयी।

"उम्मीद" एक अलग सी कथावस्तु पर आधारित प्रेम-कथा है जहाँ कहानी का नायक एक विवाहित महिला से प्यार करने लगता है। पूरी तरह मानसिक धरातल पर स्थित इस प्यार में न तो कोई शारीरिक आकर्षण है न कोई चाहत। नायिका भी उसके नियमित संपर्क में है और वो भी नायक को पसन्द करती है किंतु अपनी अपनी सरहदों और प्रतिबद्धताओं से दोनों बखूबी वाकिफ़ हैं। न कोई इक़रार न इज़हार। अचानक कुछ यूँ होता है कि इस अव्यक्त प्रेम की पीड़ा से त्रस्त नायक धीरे धीरे बीमार पड़ जाता है। लेखकीय नियंत्रण में जरा सी छूट इसे एक साधारण कहानी बना सकती थी, किन्तु एक बेहद नाज़ुक विषय को बड़ी कुशलता से निभाया है वंदना जी ने।

"एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे" एक असंतुष्ट प्रवृति के व्यक्ति की कथा है जो विवाहित होने के बावजूद अपनी प्रकृति के कारण संपर्क में आने वाली महिला मित्रों से सदैव अंतरंग होने का प्रयास करता था। कहानी की आख़िरी पात्र उसे इस मानसिकता से किस तरह मुक्त करती है, यह पढ़ना रोचक है।

"पत्ते झड़ने का मौसम" एक ऐसे ख़ुशमिज़ाज़, सहृदय और सुलझे हुए लेखक की आत्मकथा है जो अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी की मृत्यु के बाद खुद को लेखन और यात्राओं में इस कदर व्यस्त कर लेते हैं कि देखने वाले उनकी ज़िंदादिली और जज्बे से रश्क़ करते हैं और कौतुक भी कि क्या इस इंसान को कभी अकेलापन नहीं व्यापता होगा?
एक दिन जब वो नहीं रहते और कथावाचक मित्र के हाथ उनकी डायरी लगती है तब उसे मालूम पड़ता है कि वो अपनी पत्नी और उसे कितना याद करते रहे।

"बुरी औरत हूँ मैं" यह शीर्षक कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी औरत की ज़िन्दगी को बयान करती है जो अपने शौक पूरा करने के लिए कॉलेज के समय से ही कॉल गर्ल बन जाती है। उसके सौंदर्य पर मोहित कहानी का नायक सब कुछ जानते हुए भी उसे एक बेहतर जीवन देने का वायदा करते हुए उससे विवाह कर लेता है। इस कहानी का भयावह अंत ऐसे लोगों के लिए एक सबक है जो भौतिक सुख सुविधाओं की अनंत भूलभुलैया में खोकर अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। व्यक्तिगत जीवन में देखी सुनी कुछ इसी तरह की घटनाओं की स्मृति के कारण यह कहानी प्रासंगिक हो उठती है।

"कितने नादान थे हम" एक ऐसे पति पत्नी की कथा है जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं किंतु भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से बहुत दूर निकल जाते हैं। तलाक आदि कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा रास्ता तय करने के बाद अचानक वे खुद को ज़िन्दगी के रेगिस्तान में अकेले खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे की मूल भावनाओं का समुचित एहसास होता है।

"वो बाइस दिन" इस संग्रह की सबसे बेहतरीन और संवेदनशील कहानी है। नायिका के पिता कोमा की अवस्था में हैं। आसन्न मृत्यु की आहट और पीछे अकेले रह जाने को बाध्य परिजनों की उस विवशता के दौर को बेहद सधे शब्दों और अप्रतिम संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है वंदना जी ने।

"स्लीप मोड" इस संग्रह की अंतिम और गुणवत्ता में "वो बाइस दिन" के समकक्ष एक शानदार कहानी है। विस्मरण जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार होते जा रहे उम्रदराज परिजन कभी कभी हम सबकी अनजाने में की गई उपेक्षा का शिकार होते हैं। हम उनके बताने पर भी ध्यान नहीं देते और अपनी इन लापरवाहियों पर हमारा ध्यान तब जाता है जब संभावनाओं के सारे दरवाज़े बंद हो चुके रहते हैं।

इस संग्रह की कुछ आरंभिक कहानियों में वंदना जी की भाषा बहुत खटकती है। उनकी कविता का दुष्प्रभाव वाक्य विन्यासों पर बार बार नज़र आता है। शायद ये पुरानी कहानियाँ होंगी जब उनकी भाषा उतनी परिमार्जित नहीं रही होगी, किन्तु उत्तरार्द्ध की रचनाएँ पढ़ते हुए भाषा और शिल्प पर उनकी क्रमशः मजबूत होती गयी पकड़ स्पष्ट नज़र आती है। असरदार भाषा और संवेदना के स्वाभाविक प्रवाह के कारण आख़िर की कुछ कहानियाँ बेहद प्रभावशाली बन पड़ी हैं।

बुरी औरत हूँ मैं
वंदना गुप्ता
प्रकाशक-- ए.पी.एन. पब्लिकेशन
वर्ष-- 2017
मूल्य-- 270/-,
पृष्ठ-- 220

ये दिन वे दिन एवं बरगद की छाँव में

ये दिन....वे दिन और बरगद की छाँव में उषा भटनागर के कहानी संग्रह " ये दिन वे दिन" के फ्लैप पर सूर्यबाला जी लिखती हैं कि " क...